नवीनतम पोस्ट

Showing posts with label Nida Fazli. Show all posts
Showing posts with label Nida Fazli. Show all posts

Wednesday, November 20, 2013

मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार - main roya pardes me bheega maa ka pyaar

मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार,
दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार,

छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार,
आँखों भर आकाश है, बाहों भर संसार,

लेके तन के नाप को, घूमे बस्ती गाँव,
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव,

सबकी पूजा एक सी, अलग-अलग हर रीत,
मस्जिद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत,

पूजा घर में मूर्ति, मीरा के संग श्याम,
जिसकी जितनी चाकरी, उतने उसके दाम,

सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर,
जिस दिन सोए देर तक, भूखा रहे फ़कीर,

अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप,
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप,

सपना झरना नींद का, जागी आँखें प्यास,
पाना खोना खोजना साँसों का इतिहास,

चाहे गीता बांचिये या पढ़िए क़ुरान,
मेरा तेरा प्यार ही, हर पुस्तक का ज्ञान

Sunday, September 25, 2011

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीँ जाता - benaam sa ye dard thahar kyun nahin jata

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीँ जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता

सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती है निगाहेँ
क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यूँ नहीं जाता

वो एक ही चेहरा तो नहीँ सारे जहाँ में
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते है जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता

वो नाम जो बरसों से ना चेहरा ना बदन है
वो ख्वाब नगर है तो बिखर क्यूँ नहीं जाता

Sunday, June 5, 2011

दुनिया जिसे कहते हैं... - duniya jise kahte hain...

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है,
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है,

अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम,
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है,

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने,
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है,

ग़म हो के ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं,
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है.

Sunday, April 18, 2010

अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला... - ab khushi hai na koi dard rulaane wala

अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला,
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला,

उसको रुख़्सत तो किया था, मुझे मालूम न था,
सारा घर ले गया, घर छोड़ के जाने वाला,

इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है, सब की दुनिया,
कोई जल्दी में, कोई देर से जाने वाला,

एक बे-चेहरा सी उम्मीद है, चेहरा-चेहरा,
जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला,

दूर के चाँद को ढूँढो न किसी आँचल में,
ये उजाला नहीं आँगन में समाने वाला.

Saturday, August 22, 2009

कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है - kabhi-kabhi yun bhi humne apne jee ko bahlaya hai...

कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है,
जिन बातों को खुद नहीं समझे, औरों को समझाया है,

हमसे पूछो इज्ज़तवालों की इज्ज़त का हाल यहाँ,
हमने भी इस शहर में रहकर थोड़ा नाम कमाया है,

उससे बिछड़े बरसों बीते, लेकिन आज ना जाने क्यूँ?
आँगन में हँसते बच्चों को बेकार धमकाया है,

कोई मिला तो हाथ मिलाया, कहीं गए तो बातें की,
घर से बाहर जब भी निकले, दिन भर बोझ उठाया है.

Thursday, August 20, 2009

तन्हा-तन्हा हम रो लेंगे - tanha-tanha hum ro lenge...

एल्बम HOPE जगजीत जी और चित्रा जी के जीवन की सबसे बड़ी होप, उनके पुत्र विवेक के देहांत के बाद उनके जन्मदिन के मौके पर ग़ज़ल पसंदों को समर्पित किया गया था. आज 20 अगस्त, विवेक के जन्मदिन के मौके पर मैं आपके साथ उसी HOPE एल्बम से एक ख़ास ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ.

तन्हा-तन्हा हम रो लेंगे, महफ़िल-महफ़िल गायेंगे,
जब तक आंसू साथ रहेंगे, तब तक गीत सुनायेंगे,

तुम जो सोचो वो तुम जानो, हम तो अपनी कहते हैं,
देर ना करना घर जाने में, वरना घर खो जायेंगे,

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद-सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जायेंगे,

किन राहों से दूर है मंजिल, कौन-सा रास्ता आसां है,
हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे,

अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर दिल हों, मुमकिन है,
हम तो उस दिन रायें देंगे जिस दिन धोखा खाएँगे.

Monday, July 20, 2009

धूप में निकलो घटाओं में - dhoop me niklo ghataaon me

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

Tuesday, March 3, 2009

बदला ना अपने आप को - Badala na apne aap ko

बदला ना अपने आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे

दुनिया ना जीत पाओ तो हारो ना ख़ुद को तुम
थोडी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे

अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी करीब रहे दूर ही रहे

गुजरो जो बाग़ से तो दुआ मांगते रहे
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे

Monday, August 4, 2008

जब किसी से कोई गिला रखना

जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आइना रखना

यूँ उजालों से वास्ता रखना
शम्मा के पास ही हवा रखना

घर की तामीर चाहे जैसी हो
इसमें रोने की जगह रखना

मस्जिदें हैं नमाजियों के लिए
अपने घर में कहीं खुदा रखना

मिलना-जुलना जहाँ ज़रूरी हो
मिलने-जुलने का हौसला रखना

Sunday, August 3, 2008

गरज बरस प्यासी धरती पर ...

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला
चिडियों को दाने, बच्चों को गुड़-धानी दे मौला

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है
सोच समझ वालों को थोडी नादानी दे मौला

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नयी सलीबें
झूटों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला

फिर मूरत से बहार आकर चारों और बिखर जा
फिर मन्दिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला

तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यूं हो
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला