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Wednesday, August 18, 2010

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई - din kuchh aise gujarata hai koi...

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई,
जैसे एहसान उतारता है कोई,

आईना देखकर तसल्ली हुई,
हमको इस घर मैं जानता है कोई,

पक गया है शजर पे फल शायद,
फिर से पत्थर उछालता है कोई,

देर से गूंजते हैं सन्नाटे,
जैसे हमको पुकारता है कोई|

Tuesday, July 13, 2010

हाथ छूटे भी तो - haath chhute bhi to...

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते

जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा-थोड़ा
जाने वालों के लिये दिल नहीं तोड़ा करते

तूने आवाज़ नहीं दी कभी मुड़कर वरना
हम कई सदियाँ तुझे घूम के देखा करते

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते

Sunday, May 23, 2010

एक परवाज़ दिखाई दी है - ek parwaaz dikhaai di hai


एक परवाज़ दिखाई दी है,
तेरी आवाज़ सुनाई दी है,

जिसकी आँखों में कटी थीं सदियाँ
उसने सदियों की जुदाई दी है

सिर्फ एक सफहा पलट कर उसने
सारी बातों की सफाई दी है

फिर वहीँ लौट के जाना होगा,
यार ने ऐसी रिहाई दी है

आग ने क्या-क्या जलाया है शब भर,
कितनी ख़ुश रंग दिखाई दी है.

Friday, April 23, 2010

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा - zindagi yun huyi basar tanha


ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा,
क़ाफिला साथ और सफर तन्हा

अपने साये से चौंक जाते हैं,
उम्र गुज़री है इस कदर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे,
रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में,
रात होती नहीं बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था,
फिर न जाने गए किधर तन्हा.

Saturday, September 12, 2009

शाम से आँख में नमी सी है - shaam se aankh me nami si hai...

शाम से आँख में नमी सी है,
आज फिर आपकी कमी सी है,

दफ़्न कर दो हमें कि सांस मिले,
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है,

वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर,
इसकी आदत भी आदमी सी है,

कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी,
एक तस्लीम लाज़मी सी है.

Monday, August 17, 2009

वो ख़त के पुर्जे उड़ा रहा था - wo khat ke purze uda raha tha...

वो ख़त के पुर्जे उड़ा रहा था,
हवाओं का रुख दिखा था,

कुछ और ही हो गया नुमायाँ,
मैं अपना लिखा मिटा रहा था,

उसी का ईमां बदल गया है,
कभी जो मेरा खुदा रहा था,

वो एक दिन एक अजनबी को,
मेरी कहानी सुना रहा था,

वो उम्र कम कर रहा था मेरी,
मैं साल अपने बढ़ा रहा था.

Wednesday, April 22, 2009

एक पुराना मौसम लौटा, याद भरी पुरवाई भी - ek purana mausam lauta, yaad bhari purwaai bhi


एक पुराना मौसम लौटा, याद भरी पुरवाई भी
ऐसा तो कम ही होता है, वो भी हों तन्हाई भी,

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं,
कितनी सौंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी

दो-दो शक्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में
मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी,

ख़ामोशी हासिल भी एक लंबी-सी ख़ामोशी है
उनकी बात सुनी भी हमने, अपनी बात सुनाई भी.

Tuesday, April 21, 2009

आँखों में जल रहा है क्यूँ, बुझता नहीं धुँआ - aankhon me jal raha hai kyun


आँखों में जल रहा है क्यूँ, बुझता नहीं धुँआ
उठता तो है घटा-सा बरसता नहीं धुँआ,

चूल्हे नहीं जलाए या बस्ती ही जल गयी
कुछ रोज़ हो गए हैं अब, उठता नहीं धुँआ,

आँखों के पोंछने से लगा आंच का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुँआ,

आँखों से आंसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमां ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुँआ.