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Saturday, April 26, 2014

अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें... - agar hum kahen aur wo muskura den...

अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें,
हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें,

हर इक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें,
चलो ज़िन्दगी को मोहब्बत बना दें,

अगर ख़ुद को भूले तो कुछ भी न भूले,
के चाहत में उनकी, ख़ुदा को भुला दें,

कभी ग़म की आँधी, जिन्हें छू न पाए,
वफ़ाओं के हम, वो नशेमन बना दें,

क़यामत के दीवाने कहते हैं हमसे,
चलो उनके चेहरे से पर्दा हटा दें,

सज़ा दें, सिला दें, बना दें, मिटा दें,
मगर वो कोई फ़ैसला तो सुना दें.

Sunday, April 13, 2014

जब भी तन्हाई से घबरा के... - jab bhi tanhai se ghabra ke

जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं,
हम तेरी याद के दामन से लिपट जाते हैं

उन पे तूफ़ाँ को भी अफ़सोस हुआ करता है,
वो सफ़ीने जो किनारों पे उलट जाते हैं,

हम तो आए थे रहें शाख़ में फूलों की तरह,
तुम अगर ख़ार समझते हो तो हट जाते हैं.

Tuesday, June 29, 2010

बड़ी हसीं रात थी - badi haseen raat thi...

चराग-ओ-आफ़ताब[1] गुम, बड़ी हसीं रात थी,
शबाब की नक़ाब[2] गुम, बड़ी हसीं रात थी

मुझे पिला रहे थे वो कि खुद ही शम्मा बुझ गयी,
गिलास गुम, शराब गुम, बड़ी हसीं रात थी

लिखा था जिस जिस किताब में कि इश्क़ तो हराम है
हुई वही किताब गुम, बड़ी हसीं रात थी

लबों से लब जो मिल गए, लबों से लब ही सिल गए,
सवाल गुम, जवाब गुम, बड़ी हसीं रात थी.


Friday, May 1, 2009

पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम - patthar ke khuda, patthar ke sanam...

पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम
पत्थर के ही इंसान पायें हैं
तुम शहर-ऐ-मोहब्बत कहते हो
हम जान बचा कर आए हैं

बुतखाना समझते हो जिसको
पूछो ना वहां क्या हालत है
हम लोग वहीं से लौटे हैं
बस शुक्र करो लौट आए हैं

हम सोच रहे हैं मुद्दत से
अब उम्र गुजारें भी तो कहाँ
सेहरा में खुशी के फूल नहीं
शहरों में ग़मों के साए हैं

होठों पे तबस्सुम हल्का-सा
आँखों में नमी-सी ए "फाकिर"
हम अहल-ऐ-मोहब्बत पर अक्सर
ऐसे भी ज़माने आए हैं.

Tuesday, July 22, 2008

शायद मैं जिंदगी की सहर ले के आ गया

शायद मैं जिंदगी की सहर ले के आ गया
क़ातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया

ता उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क की
अंजाम ये के गर्द-ऐ-सफर ले के आ गया

नश्तर है मेरे हाथ में कांधों पे मैकदा
लो मैं इलाज-ऐ-दर्द-ऐ-जिगर ले के आ गया

'फाकिर' सनम मैकदे में न आता मैं लौटकर
इक ज़ख्म भर गया था इधर ले के आ गया

Tuesday, July 15, 2008

ये दौलत भी ले लो

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी

मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी
वो बुढिया जिसे बच्चे कहते थे नानी
वो नानी की बातों में परियों का डेरा
वो चेहरे की झ्रुरियों में सदियों का फेरा
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई
वो छोटी-सी रातें वो लम्बी कहानी

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिडिया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना
वो गुडिया की शादी पे लड़ना झगड़ना
वो झूलों से गिरना, वो गिर के संभालना
वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफे
वो टूटी हुई चूडियों की निशानी

कभी रेत के ऊँचे तिलों पे जाना
घरोंदे बनाना, बना के मिटाना
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी
वो ख्वाबों खिलोनों की जागीर अपनी
ना दुनिया का गम था ना रिश्तों के बंधन, बड़ी खूबसूरत थी वो जिंदगानी