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Wednesday, March 16, 2011

ये क्या जाने में जाना है... - ye kya jaane me jaana hai

ये क्या जाने में जाना है, जाते हो ख़फ़ा हो कर
मैं जब जानूं मेरे दिल से चले जाओ जुदा हो कर

क़यामत तक उड़ेगी दिल से उठकर ख़ाक आँखों तक
इसी रस्ते गया है हसरतों का क़ाफ़िला हो कर

तुम्ही अब दर्द-ऐ-दिल के नाम से घबराए जाते हो
तुम्ही तो दिल में शायद आए थे दर्द-ऐ-आशियाँ हो कर

यूँ ही हम तुम घड़ी भर को मिला करते थे बेहतर था
ये दोनों वक़्त जैसे रोज़ मिलते हैं जुदा हो कर

Tuesday, October 6, 2009

तेरे क़दमों पे सर होगा - tere kadmon pe sar hoga...

तेरे क़दमों पे सर होगा, कज़ा सर पे खड़ी होगी,
फिर उस सजदे का क्या कहना, अनोखी बंदगी होगी.

नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी,
किसी की आखरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी.

दिखा दूंगा सर-ए-महफिल, बता दूंगा सर-ए-मेहशिर,
वो मेरे दिल में होंगे और दुनिया देखती होगी.

मज़ा आ जायेगा मेहशिर में फिर सुनने सुनाने का,
जुबां होगी वहां मेरी, कहानी आपकी होगी.

तुम्हें दानिस्ता महफिल में जो देखा हो तो मुजरिम,
नज़र आखिर नज़र है, बेइरादा उठ गयी होगी.