आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
वक्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा
इतना मानूस न हो खिलवत-ऐ-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा
तुम सर-ऐ-राह-ऐ-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ऐ-रिफ़ाक़त से उतर जाएगा,
ज़िन्दगी तेरी अता है तो यह जाने वाला
तेरी बख्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा
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Wednesday, July 29, 2009
Tuesday, July 28, 2009
फिर उसी रहगुज़र पर, शायद - phir usi rahguzar par,shayad...
फिर उसी रहगुज़र पर, शायद
हम कभी मिल सकें, मगर शायद
जान-पहचान से भी क्या होगा,
फिर भी ऐ दोस्त, गौर कर, शायद
मुन्तज़िर जिनके हम रहे,
उनको मिल गए और हमसफ़र, शायद
जो भी बिछडे हैं, कब मिले हैं "फ़राज़"
फिर भी तू इंतज़ार कर, शायद...
हम कभी मिल सकें, मगर शायद
जान-पहचान से भी क्या होगा,
फिर भी ऐ दोस्त, गौर कर, शायद
मुन्तज़िर जिनके हम रहे,
उनको मिल गए और हमसफ़र, शायद
जो भी बिछडे हैं, कब मिले हैं "फ़राज़"
फिर भी तू इंतज़ार कर, शायद...