नवीनतम पोस्ट

Showing posts with label सलाम मछली शहरी. Show all posts
Showing posts with label सलाम मछली शहरी. Show all posts

Friday, November 25, 2011

बहुत दिनों की बात है - bahut dinon ki baat hai

बहुत दिनों की बात है
फिज़ा को याद भी नहीं
ये बात आज की नहीं
बहुत दिनों की बात है
शबाब पर बहार थी
फिज़ा भी ख़ुशगवार थी
ना जाने क्यूँ मचल पड़ा
मैं अपने घर से चल पड़ा
किसी ने मुझको रोक कर
बड़ी अदा से टोक कर
कहा था लौट आईये
मेरी क़सम ना जाईये
पर मुझे ख़बर न थी
माहौल पर नज़र न थी
ना जाने क्यूँ मचल पड़ा
मैं अपने घर से चल पड़ा
मैं शहर से फिर आ गया
ख़याल था कि पा गया
उसे जो मुझसे दूर थी
मगर मेरी ज़रूर थी
और एक हसीन शाम को
मैं चल पड़ा सलाम को
गली का रंग देख कर
नई तरंग देख कर
मुझे बड़ी ख़ुशी हुई
मैं कुछ इसी ख़ुशी में था
किसी ने झांक कर कहा
पराये घर से जाईये
मेरी क़सम न आईये
वही हसीन शाम है
बहार जिसका नाम है
चला हूँ घर को छोड़ कर
न जाने जाऊँगा किधर
कोई नहीं जो टोक कर
कोई नहीं जो रोक कर
कहे कि लौट आईये
मेरी क़सम न जाईये