नवीनतम पोस्ट

Monday, November 1, 2010

वस्ल की रात तो राहत से - wasl ki raat to raahat se

वस्ल की रात तो राहत से बसर होने दो,
शाम से ही है ये धमकी के सहर होने दो

जिसने ये दर्द दिया है वो दवा भी देगा,
नादवा है जो मेरा दर्द-ए-जिगर होने दो

ज़िक्र रुख़सत का अभी से न करो बैठो भी,
जान-ए-मन रात गुज़रने दो सहर होने दो

वस्ल-ए-दुश्मन की ख़बर मुझसे अभी कुछ ना कहो,
ठहरो-ठहरो मुझे अपनी तो ख़बर होने दो.

Friday, October 29, 2010

फूल खिला दे शाखों पर - phool khila de shaakhon par...

फूल खिला दे शाखों पर, पेड़ों को फल दे मालिक,
धरती जितनी प्यासी है, उतना तो जल दे मालिक

वक़्त बड़ा दुखदायक है, पापी है संसार बहुत,
निर्धन को धनवान बना, दुर्बल को बल दे मालिक

कोहरा कोहरा सर्दी है, काँप रहा है पूरा गाँव,
दिन को तपता सूरज दे, रात को कम्बल दे मालिक

बैलों को एक गठरी घास, इंसानों को दो रोटी,
खेतों को भर गेहूं से, कांधों को हल दे मालिक

हाथ सभी के काले हैं, नजरें सबकी पीली हैं,
सीना ढांप दुपट्टे से, सर को आँचल दे मालिक

Tuesday, September 14, 2010

मय पिलाकर आपका क्या जाएगा - may pilakar aapka kya jayega...

मय पिलाकर आपका क्या जाएगा,
जाएगा ईमान जिसका जायेगा,

देखकर मुझको वो शरमा जाएगा,
ये तमाशा किससे देखा जायेगा.

जाऊं बुतखाने से क्यूँ काबे को मैं,
हाथ से ये भी ठिकाना जाएगा,

क़त्ल की जब उसने दी धमकी मुझे,
कह दिया मैंने कि देखा जायेगा.

पी भी ले दो घूँट "ज़ाहिद" पी भी ले,
मयकदे से कौन प्यासा जायेगा.

Wednesday, September 1, 2010

प्यार का पहला ख़त - pyar ka pahla khat...

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है,
नये परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है.

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था,
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है.

गाँठ अगर पड़ जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी,
लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है.

हमने इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल तो ढूँढ़ लिया है,
गहरे ज़ख़्मों को भरने में वक़्त तो लगता है।

Thursday, August 26, 2010

मेरा दिल भी शौक से तोड़ो - mera dil bhi shauq se todo...

मेरा दिल भी शौक से तोड़ो, एक तजुर्बा और सही,
लाख खिलौने तोड़ चुके हो, एक खिलौना और सही.

रात है ग़म की आज बुझा दो जलता हर एक चराग,
दिल में अंधेरा हो ही चुका है, घर में अंधेरा और सही.

दम है निकलता एक आशिक़ का, भीड़ है आ कर देख तो लो,
लाख तमाशे देखे होंगे, एक नज़ारा और सही.

खंजर लेकर सोचते क्या हो क़त्ल "मुराद" भी कर डालो,
दाग हैं सौ दामन पे तुम्हारे एक इजाफा और सही.

Saturday, August 21, 2010

है इख्तियार में तेरे - hai ikhtiyaar me tere...

है इख्तियार में तेरे तो मौजज़ा कर दे,
वो शख्स मेरा नहीं है, उसे मेरा कर दे.

ये रेखज़ार कहीं ख़त्म ही नहीं होता,
ज़रा-सी दूर तो रास्ता हरा-भरा कर दे.

मैं उसके ज़ोर को देखूं, वो मेरा सब्र-ओ-सुकूं,
मुझे चराग बना दे, उसे हवा कर दे.

अकेली शाम बहुत ही उदास करती है,
किसी को भेज, कोई मेरा हमनवा कर दे.

Wednesday, August 18, 2010

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई - din kuchh aise gujarata hai koi...

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई,
जैसे एहसान उतारता है कोई,

आईना देखकर तसल्ली हुई,
हमको इस घर मैं जानता है कोई,

पक गया है शजर पे फल शायद,
फिर से पत्थर उछालता है कोई,

देर से गूंजते हैं सन्नाटे,
जैसे हमको पुकारता है कोई|

Thursday, August 5, 2010

We are on FaceBook - Join us.

Dear Jagjit Singh Fans,

We are happy to announce our presence on Facebook.
The url to access our Facebook page is http://www.facebook.com/jagjitchitrasingh. Kindly join us and suggest your friends to join the page.

Thanks and Regards.

Tuesday, July 27, 2010

मैं ख़याल हूँ किसी और का - main khayaal hun kisi aur ka...

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आईना मेरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है

मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है

तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता न था
तेरी दास्ताँ कोई और थी मेरा वाक़या कोई और है.

Monday, July 26, 2010

अबके बरस भी वो... - abke baras bhi wo...

अबके बरस भी वो नहीं आये बहार में,
गुजरेगा और एक बरस इंतज़ार में.

ये आग इश्क़ की है बुझाने से क्या बुझे?
दिल तेरे बस में है ना मेरे इख्तियार में.

है टूटे दिल में तेरी मुहब्बत, तेरा ख़याल,
कुछ रंग है बहार के उजड़ी बहार में.

आंसू नहीं है आँख में लेकिन तेरे बगैर,
तूफ़ान छुपे हुए हैं दिल-ए-बेकरार में.

Tuesday, July 13, 2010

हाथ छूटे भी तो - haath chhute bhi to...

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते

जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा-थोड़ा
जाने वालों के लिये दिल नहीं तोड़ा करते

तूने आवाज़ नहीं दी कभी मुड़कर वरना
हम कई सदियाँ तुझे घूम के देखा करते

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते

Monday, July 5, 2010

अब मेरे पास तुम आई हो - ab mere paas tum aayi ho...

अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?

मैनें माना के तुम इक पैकर-ए-रानाई हो
चमन-ए-दहर में रूह-ए-चमन आराई हो
तलत-ए-मेहर हो फ़िरदौस की बरनाई हो
बिन्त-ए-महताब हो गर्दूं से उतर आई हो

मुझसे मिलने में अब अंदेशा-ए-रुसवाई है
मैने खुद अपने किये की ये सज़ा पाई है

ख़ाक में आह! मिलाई है जवानी मैनें
शोलाज़ारों में जलाई है जवानी मैनें
शहर-ए-ख़ूबां में गंवाई है जवानी मैनें
ख़्वाबगाहों में गंवाई है जवानी मैनें

हुस्न ने जब भी इनायत की नज़र ड़ाली है
मेरे पैमान-ए-मोहब्बत ने सिपर ड़ाली है

उन दिनों मुझ पे क़यामत का जुनूं तारी था
सर पे सरशरी-ओ-इशरत का जुनूं तारी था
माहपारों से मोहब्बत का जुनूं तारी था
शहरयारों से रक़ाबत का जुनूं तारी था

एक बिस्तर-ए-मखमल-ओ-संजाब थी दुनिया मेरी
एक रंगीन-ओ-हसीं ख्वाब थी दुनिया मेरी

क्या सुनोगी मेरी मजरूह जवानी की पुकार
मेरी फ़रियाद-ए-जिगरदोज़ मेरा नाला-ए-ज़ार
शिद्दत-ए-कर्ब में ड़ूबी हुई मेरी गुफ़्तार
मैं के खुद अपने मज़ाक़-ए-तरब आगीं का शिकार

वो गुदाज़-ए-दिल-ए-मरहूम कहां से लाऊँ
अब मै वो जज़्बा-ए-मासूम कहां से लाऊँ

अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?

Thursday, July 1, 2010

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है - angdaai pe angdaai leti hai...

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की,
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की

कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में,
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की

वस्ल की रात ना जाने क्यों इसरार था उनको जाने पर,
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की

उड़ते उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया,
रोते रोते बैठ गयी आवाज़ किसी सौदाई की.

Tuesday, June 29, 2010

बड़ी हसीं रात थी - badi haseen raat thi...

चराग-ओ-आफ़ताब[1] गुम, बड़ी हसीं रात थी,
शबाब की नक़ाब[2] गुम, बड़ी हसीं रात थी

मुझे पिला रहे थे वो कि खुद ही शम्मा बुझ गयी,
गिलास गुम, शराब गुम, बड़ी हसीं रात थी

लिखा था जिस जिस किताब में कि इश्क़ तो हराम है
हुई वही किताब गुम, बड़ी हसीं रात थी

लबों से लब जो मिल गए, लबों से लब ही सिल गए,
सवाल गुम, जवाब गुम, बड़ी हसीं रात थी.


Friday, June 25, 2010

वो फ़िराक और विसाल कहाँ? - wo firaaq aur wo visaal kahan?

वो फ़िराक[1] और विसाल[2] कहाँ?
वो शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहाँ?

थी वो एक शख्स के तसव्वुर[3] से
अब वो रानाई[4]-ए-ख़याल कहाँ?

ऐसा आसां नहीं लहू रोना
दिल में ताक़त जिगर में हाल कहाँ?

फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ?

Tuesday, June 22, 2010

दिल ही तो है - dil hi to hai...

दिल ही तो है ना संग[1]-ओ-खिश्त[2] दर्द से भर ना आये क्यों?
रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों?

दैर[3] नहीं, हरम[4] नहीं, दर नहीं आस्तां[5] नहीं
बैठे हैं रहगुज़र[6] पे हम, ग़ैर हमे उठाये क्यों?

हाँ वो नहीं खुदा परस्त, जाओ वो बेवफा सही
जिसको हो दीन-ओ-दिल अजीज़, उसकी गली में जाए क्यों?

"ग़ालिब"-ए-खस्ता के बगैर कौन से काम बंद हैं,
रोइए ज़ार-ज़ार क्या, कीजिये हाय-हाय क्यों?

Saturday, June 19, 2010

आह को चाहिए - aah ko chahiye...

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक?

आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक?

हमने माना के तगाफुल[1] ना करोगे, लेकिन
ख़ाक हो जायेगे हम तुमको ख़बर होने तक

ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किससे हो जुज़ मर्ग[2] इलाज़
शम्मा हर रंगे में जलती है सहर होने तक

Friday, June 4, 2010

कौन आएगा यहाँ - kaun aayega yahan

कौन आएगा यहाँ, कोई ना आया होगा,
मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा.

दिल-ए-नादाँ ना धड़क, ए दिल-ए-नादाँ ना धड़क,
कोई ख़त ले के पडौसी के घर आया होगा.

गुल से लिपटी हुई तितली को गिराकर देखो,
आँधियों तुमने दरख्तों को गिराया होगा.

"कैफ़" परदेस में मत याद करो अपना मकान,
अबके बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा.

Sunday, May 23, 2010

एक परवाज़ दिखाई दी है - ek parwaaz dikhaai di hai


एक परवाज़ दिखाई दी है,
तेरी आवाज़ सुनाई दी है,

जिसकी आँखों में कटी थीं सदियाँ
उसने सदियों की जुदाई दी है

सिर्फ एक सफहा पलट कर उसने
सारी बातों की सफाई दी है

फिर वहीँ लौट के जाना होगा,
यार ने ऐसी रिहाई दी है

आग ने क्या-क्या जलाया है शब भर,
कितनी ख़ुश रंग दिखाई दी है.

Friday, April 23, 2010

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा - zindagi yun huyi basar tanha


ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा,
क़ाफिला साथ और सफर तन्हा

अपने साये से चौंक जाते हैं,
उम्र गुज़री है इस कदर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे,
रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में,
रात होती नहीं बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था,
फिर न जाने गए किधर तन्हा.

Wednesday, April 21, 2010

हर एक बात पे कहते हो - har ek baat pe kahte ho...

हर एक बात पे कहते हो तुम कि "तू क्या है"?
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है?

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है?

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन,
हमारी जेब को अब हाजत[1]-ए-रफू[2] क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
कुरेदते हो अब राख, जुस्तजू क्या है?

रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार[3], और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद पे कहिये कि आरज़ू क्या है?

Tuesday, April 20, 2010

गुम सुम ये जहाँ है - gum sum ye jahan hai...

गुम सुम ये जहाँ है, हमदम तू कहाँ है,
ग़मज़दा हो गई, ज़िंदगी आ भी जा,

रात बैठी है बाहे पसारे, सिसकियाँ ले रहे हैं सितारे,
कोई टूटा हुआ दिल पुकारे, हमदम तू कहाँ है,

आज आने का वादा भुला कर, ना-उम्मीदी की आंधी चला कर,
आशियाना वफ़ा का जला कर, हमदम तू कहाँ है.