नवीनतम पोस्ट

Thursday, July 1, 2010

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है - angdaai pe angdaai leti hai...

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की,
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की

कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में,
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की

वस्ल की रात ना जाने क्यों इसरार था उनको जाने पर,
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की

उड़ते उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया,
रोते रोते बैठ गयी आवाज़ किसी सौदाई की.

2 comments:

Udan Tashtari said...

आभार इस गज़ल को पढ़वाने का.

Indian Girl said...

thnks