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Friday, June 25, 2010

वो फ़िराक और विसाल कहाँ? - wo firaaq aur wo visaal kahan?

वो फ़िराक[1] और विसाल[2] कहाँ?
वो शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहाँ?

थी वो एक शख्स के तसव्वुर[3] से
अब वो रानाई[4]-ए-ख़याल कहाँ?

ऐसा आसां नहीं लहू रोना
दिल में ताक़त जिगर में हाल कहाँ?

फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ?

Tuesday, June 22, 2010

दिल ही तो है - dil hi to hai...

दिल ही तो है ना संग[1]-ओ-खिश्त[2] दर्द से भर ना आये क्यों?
रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों?

दैर[3] नहीं, हरम[4] नहीं, दर नहीं आस्तां[5] नहीं
बैठे हैं रहगुज़र[6] पे हम, ग़ैर हमे उठाये क्यों?

हाँ वो नहीं खुदा परस्त, जाओ वो बेवफा सही
जिसको हो दीन-ओ-दिल अजीज़, उसकी गली में जाए क्यों?

"ग़ालिब"-ए-खस्ता के बगैर कौन से काम बंद हैं,
रोइए ज़ार-ज़ार क्या, कीजिये हाय-हाय क्यों?

Saturday, June 19, 2010

आह को चाहिए - aah ko chahiye...

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक?

आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक?

हमने माना के तगाफुल[1] ना करोगे, लेकिन
ख़ाक हो जायेगे हम तुमको ख़बर होने तक

ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किससे हो जुज़ मर्ग[2] इलाज़
शम्मा हर रंगे में जलती है सहर होने तक

Wednesday, April 21, 2010

हर एक बात पे कहते हो - har ek baat pe kahte ho...

हर एक बात पे कहते हो तुम कि "तू क्या है"?
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है?

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है?

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन,
हमारी जेब को अब हाजत[1]-ए-रफू[2] क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
कुरेदते हो अब राख, जुस्तजू क्या है?

रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार[3], और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद पे कहिये कि आरज़ू क्या है?

Wednesday, October 14, 2009

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी... - hazaaro khwaahishe aisi...

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले.

निकलना खुल्द से आदम का सुनते हैं आये हैं लेकिन,
बहुत बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले.

मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का,
उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफिर पे दम निकले.

खुदा के वास्ते पर्दा ना काबे से उठा जालिम,
कहीं ऐसा ना हो, यां भी वही काफिर सनम निकले.

कहाँ मैखाने का दरवाज़ा "ग़ालिब" और कहाँ वाइज़,
पर इतना जानते हैं, कल वो आता था के हम निकले.

कब से हूँ क्या बताऊँ... - kab se hun kya bataau...

क़ासिद के आते आते ख़त एक और लिख रखूँ,
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में.

कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ए-ख़राब में,
शब हाय हिज्र को भी रखूं गर हिसाब में.

मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था दौर-ए-जाम,
साक़ी ने कुछ मिला ना दिया हो शराब में.

ता फिर ना इंतज़ार में नींद आये उम्र भर,
आने का अहद कर गए आये जो ख्वाब में.

ग़ालिब छुटी शराब पर अब भी कभी कभी,
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में.