नवीनतम पोस्ट

Thursday, February 26, 2009

मेरे जलते हुए सीने का दहकता - mere jalte huye seene ka dahakta...

मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुख़सत कर दो
साथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर से
अपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताज
फेंक दो जिस्म से किरणों का सुनहरी ज़ेवर
तुम्ही तन्हा मेरे ग़म खाने में आ सकती हो
एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रखा है
मेरे जलते हुए सीने का दहकता हुआ चाँद

9 comments:

बी एस पाबला said...

हिंदी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है

अजित वडनेरकर said...

आपका स्वागत है....

Web Master said...

पाबला जी, वडनेरकर जी! शुक्रिया आप दोनों का!

Yusuf Kirmani said...

भाई वेब मास्टर, बहुत खूबसूरत शायरी से आपने हम लोगों को रूबरू कराया। शुक्रिया। वक्त निकालकर मेरे ब्लॉग पर भी आएं।

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया गज़ल लिखी है।बधाई।

नारदमुनि said...

narayan narayan

neeraj said...

very nice

prateek singh said...

बहुत ही खूबसूरत शायरी लिखी है आपने अब ऐसी ही शायरियां ग़ज़ल ( जिंदगी जिंदगी) भी पढ़ सकते हैं.........