मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुख़सत कर दो
साथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर से
अपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताज
फेंक दो जिस्म से किरणों का सुनहरी ज़ेवर
तुम्ही तन्हा मेरे ग़म खाने में आ सकती हो
एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रखा है
मेरे जलते हुए सीने का दहकता हुआ चाँद
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Thursday, February 26, 2009
उम्र जलवों में बसर हो
उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं
हर शब-ऐ-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं
चश्म-ऐ-साक़ी से पियो या लब-ऐ-सागर से पियो
बेखुदी आठों पहर हो ये ज़रूरी तो नहीं
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है
उनकी आगोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं
शेख करता तो है मस्जिद में खुदा को सजदे
उसके सजदे में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं
सब की नज़रों में हो साकी ये ज़रूरी तो है मगर
सब पे साकी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं
हर शब-ऐ-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं
चश्म-ऐ-साक़ी से पियो या लब-ऐ-सागर से पियो
बेखुदी आठों पहर हो ये ज़रूरी तो नहीं
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है
उनकी आगोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं
शेख करता तो है मस्जिद में खुदा को सजदे
उसके सजदे में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं
सब की नज़रों में हो साकी ये ज़रूरी तो है मगर
सब पे साकी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं
Monday, September 15, 2008
ऐ खुदा रेत के सेहरा को
ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे
या छलकती आंखों को भी पत्थर कर दे
तुझको देखा नहीं महसूस किया है मैंने
आ किसी दिन मेरे एहसास को पैकर
और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे