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Friday, April 18, 2014

और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का... - aur to koi bas na chalega hijr ke dard ke maron ka

और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का,
सुबह का होना दूभर कर दें रस्ता रोक सितारों का,

झूठे सिक्कों में भी उठा देते हैं अक्सर सच्चा माल,
शक्लें देख के सौदा करना काम है इन बंजारों का,

अपनी ज़ुबां से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग,
तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का,

एक ज़रा-सी बात थी जिस का चर्चा पहुंचा गली-गली,
हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का,

दर्द का कहना चीख उठो दिल का तक़ाज़ा वज़'अ निभाओ,
सब कुछ सहना चुप-चुप रहना काम है इज़्ज़तदारों का,

जिस जिप्सी का ज़िक्र है तुमसे दिल को उसी की खोज रही,
यूँ तो हमारे शहर में अक्सर मेला लगा निगारों का,

'इंशा' जी अब अजनबियों में चैन से बाक़ी उम्र कटे,
जिनकी ख़ातिर बस्ती छोड़ी नाम न लो उन प्यारों का.

Wednesday, July 30, 2008

कल चौदहवीं की रात थी... - kal chaudahvin ki raat thi

अंदाज़ अपने देखते हैं आइने में वो
और ये भी देखते हैं कोई देखता ना हो

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेराकुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा

हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पुछा किए
हम हंस दिए, हम चुप रहे मंज़ूर था परदा तेरा

इस शहर में किससे मिलें, हमसे तो छूटीं महफिलें
हर शख्स तेरा नाम ले, हर शख्स दीवाना तेरा

कूंचे को तेरे छोड़कर जोगी ही बन जाएँ मगर
जंगल तेरे परबत तेरी बस्ती तेरी सेहरा तेरा

बेदर्द सुननी हो तो चल कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, 'इंशा' तेरा