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Sunday, August 14, 2011

ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं - zindagi tune lahoo le ke diya kuchh bhi nahin

ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं,
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं,

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो,
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं,

हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ,
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं,

या खुदा अबके ये किस रंग में आई है बहार,
ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं,

दिल भी एक जिद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह,
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं,

Saturday, July 30, 2011

सच्ची बात कही थी मैंने - sachchi baat kahi thi maine

सच्ची बात कही थी मैंने,

लोगों ने सूली पे चढाया,
मुझ को ज़हर का जाम पिलाया,
फिर भी उनको चैन न आया,
सच्ची बात कही थी मैंने,

ले के जहाँ भी वक्त गया है,
ज़ुल्म मिला है, ज़ुल्म सहा है,
सच का ये इनाम मिला है,
सच्ची बात कही थी मैंने,

सब से बेहतर कभी न बनना,
जग के रहबर कभी न बनना,
पीर पयम्बर कभी न बनना,

चुप रह कर ही वक्त गुजारो,
सच कहने पे जान मत वारो,
कुछ तो सीखो मुझ से यारों,

सच्ची बात कही थी मैंने

Monday, June 6, 2011

तुमने सूली पे लटकते जिसे देखा होगा - tumne sooli pe latakte jise dekha hoga

तुमने सूली पे लटकते जिसे देखा होगा,
वक़्त आएगा वही शख्स मसीहा होगा,

ख्वाब देखा था कि सेहरा में बसेरा होगा,
क्या ख़बर थी कि यही ख्वाब तो सच्चा होगा,

मैं फ़िज़ाओं में बिखर जाऊंगा खुशबू बनकर,
रंग होगा न बदन होगा न चेहरा होगा