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Wednesday, May 4, 2011

मैं भूल जाऊं तुम्हें - main bhool jaaun tumhe


मैं भूल जाऊं तुम्हें
अब यही मुनासिब है
मगर भुलाना भी चाहूं
तो किस तरह भूलूं
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो
कोई ख़्वाब नहीं
यहां तो दिल का ये आलम है
क्या कहूं...
कम्बख़्त...
भुला सका ना ये वो सिलसिला जो था ही नहीं
वो इक ख़याल जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुमसे
वो एक रब्त जो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं
अगर ये हाल है दिल का तो कोई समझाए
तुम्हें भुलाना भी चाहूं तो किस तरह भूलूं
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं

Monday, April 18, 2011

देखा जो आईना तो मुझे सोचना पड़ा... - dekha jo aaina to mujhe sochna pada

देखा जो आईना तो मुझे सोचना पड़ा,
ख़ुद से न मिल सका तो मुझे सोचना पड़ा,

उसका जो ख़त मिला तो मुझे सोचना पड़ा,
अपना-सा वो लगा तो मुझे सोचना पड़ा,

मुझको था ये गुमाँ के मुझ ही में है इक अना,
देखी तेरी अना तो मुझे सोचना पड़ा,

दुनिया समझ रही थी के नाराज़ मुझसे है,
लेकिन वो जब मिला तो मुझे सोचना पड़ा,

सर को छुपाऊँ अपने के पैरों को ढाँप लूँ,
छोटी सी थी रिदा तो मुझे सोचना पड़ा,

इक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा 'फ़राग़'
जब ख़ुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा.

Tuesday, March 22, 2011

शाम होने को है... - shaam hone ko hai

शाम होने को है,

लाल सूरज समंदर में खोने को है
और उसके परे कुछ परिंदे 
कतारें बनाए
उन्हीं जंगलों को चले
जिनके पेड़ों की शाखों पे हैं घोंसले
ये परिंदे वहीं लौटकर जाएंगे
और सो जाएंगे
हम ही हैरान हैं
इस मकानों के जंगल में
अपना कोई भी ठिकाना नहीं
शाम होने को है हम कहाँ जाएंगे